Vigraharaja IV (Visaladeva) Chauhan Dynasty

Vigraharaja IV (Visaladeva) Chauhan (Chahamana) Dynasty

विग्रहराज चतुर्थ Vigraharaja IV, जिनको ‘वीसलदेव चौहान‘ के नाम से भी जाना जाता है उत्तर-पश्चिम भारत में स्थित चौहान (चहामन) वंश Chauhan Dynasty के एक राजा थे। चौहान डायनेस्टी के इस आर्टिकल में विग्रहराज चतुर्थ उर्फ बीसलदेव के बारे में विस्तार से सब कुछ बताया गया है। साथ ही सभी ऐतिहासिक तथ्यों को शामिल किया गया है जो कि UPSC एवं RPSC की तैयारी के लिए वन स्टॉप सेंटर है।  

जिन्होंने वर्ष 1150 से 1164 ई तक शासन किया था, विग्रहराज चतुर्थ ने चौहान (चहामन Chahamana) राज्य के पड़ोसी राज्यों के साथ मिलकर एक महान साम्राज्य बनाया था, जिनमें तोमर, चौलुक्य, और नड्डुला राज्य शामिल थे। विग्रहराज चतुर्थ (वीसलदेव चौहान) ने कई मुस्लिम आक्रमणकारियों की हड्डियों को तोडा जिनमें गजनवी शासक बहराम शाह और खुसरो शाह शामिल थे।

विग्रहराज चतुर्थ उर्फ ‘वीसलदेव चौहान’ के राज्य की सीमा राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और पंजाब और उत्तर प्रदेश के भी कुछ हिस्सों तक फैली हुई थी। विग्रहराज चतुर्थ उर्फ ‘वीसलदेव चौहान’ Bisaldev Chauhan ने अपनी राजधानी अजमेर (अजयमेरु) में कई भव्य इमारतें बनवाईं थी लेकिन बाद में अजमेर के मुस्लिम अधिग्रहण के बाद नष्ट हो गईं या मुस्लिम संरचनाओं में परिवर्तित हो गईं। इनमें से एक संस्कृत शिक्षा केंद्र शामिल था जो बाद में ‘अढ़ाई दिन का झोंपड़ा‘ नामक मस्जिद में परिवर्तित हो गया।

विग्रहराज चतुर्थ उर्फ ‘वीसलदेव चौहान’ ने ‘हरकेलि नाटक‘ लिखा था, यह उनके द्वारा लिखित एक संस्कृत भाषा का नाटक था, जिसका शिलालेख मस्जिद स्थल पर मिला।

शिवालिका अभिलेख के अनुसार इन्होने चौहान शासकों में सर्वाधिक साम्राज्य विस्तार किया था। शिवालिका अभिलेख के अनुसार इनको विष्णु का अवतार तक कहा गया है। बीसलदेव चौहान ने दिल्ली के तंवर शासक को हराकर दिल्ली पर सम्पूर्ण अधिकार पाया था। ऐसा करने वाला ये प्रथम चौहान शासक था। बीसलदेव चौहान ने भारत की राजधानी “अजमेर” बनाई थी। 

Vigraharaja IV (Visaladeva) Chauhan Dynasty

अजमेर के शासक अर्नोराजा (अर्णोराज) के चार बेटे सोमेश्वर, जगद्देव, विग्रहराज चतुर्थ Vigraharaja IV और देवदत्त थे। अर्नोराजा (अर्णोराज) के जीवित रहते ही उनके बड़े बेटे जगद्देव (मनवर के सुधाव) ने अपने पिता अर्नोराजा की हत्या कर दी। इतिहासकार प्रोफेसर एच चौधरी का मत है कि हेमचंद्र सूरि की पराशक्ति से वशीभूत होकर राजकुमार जगद्देव ने अपने पिता अर्नोराजा की हत्या की थी। और कुछ समय के लिए चाहमान (चौहान) सिंहासन पर कब्जा कर लिया था। इसलिए जगद्देव को चौहान (चाहमान) राजवंश का प्रथम पितृहन्ता (पिता की हत्या करने वाला) कहा गया है।

इससे पहले कि जगद्देव राज्य में अपनी स्थिति मजबूत कर पाते, उनके छोटे भाई विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) ने उन्हें गद्दी से उतार दिया और विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव चौहान) नए चाहमान राजा बन गए। पृथ्वीराज विजया में जगद्देव को एकमात्र चाहमान शासक के रूप में वर्णित किया गया है जिसने स्वर्ग प्राप्त नहीं किया क्युकि जगद्देव ने अपने पिता अर्नोराजा की हत्या कर दी थी।

विग्रहराज चतुर्थ उर्फ बीसलदेव चौहान (Vigraharaja IV (Visaladeva)) ने जगद्देव को गिरफ्तार करवा कर देश से बहार कर दिया। विग्रहराज के सौतेले भाई, सोमेश्वर का पालन-पोषण उनके चौलुक्य मामा रिश्तेदारों द्वारा गुजरात में किया गया था। विग्रहराज संभवतः अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए जग्गदेव की हत्या करने के बाद सिंहासन पर बैठे।

विग्रहराज चतुर्थ, जिनको ‘वीसलदेव चौहान‘ के नाम से भी जाना जाता है उत्तर-पश्चिम भारत में स्थित चौहान (चहामन) वंश के एक राजा थे।
जिन्होंने वर्ष 1150 से 1164 ई तक शासन किया था, विग्रहराज चतुर्थ ने चौहान (चहामन) राज्य के पड़ोसी राज्यों के साथ मिलकर एक महान साम्राज्य बनाया था, जिनमें तोमर, चौलुक्य, और नड्डुला राज्य शामिल थे। विग्रहराज चतुर्थ (वीसलदेव चौहान) ने कई मुस्लिम आक्रमणकारियों की हड्डियों को तोडा जिनमें गजनवी शासक बहराम शाह और खुसरो शाह शामिल थे।

विग्रहराज चतुर्थ उर्फ ‘वीसलदेव चौहान’ के राज्य की सीमा राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और पंजाब और उत्तर प्रदेश के भी कुछ हिस्सों तक फैली हुई थी। विग्रहराज चतुर्थ उर्फ ‘वीसलदेव चौहान’ ने अपनी राजधानी अजमेर (अजयमेरु) में कई भव्य इमारतें बनवाईं थी लेकिन बाद में अजमेर के मुस्लिम अधिग्रहण के बाद नष्ट हो गईं या मुस्लिम संरचनाओं में परिवर्तित हो गईं। इनमें से एक संस्कृत शिक्षा केंद्र शामिल था जो बाद में ‘अढ़ाई दिन का झोंपड़ा‘ नामक मस्जिद में परिवर्तित हो गया।

विग्रहराज चतुर्थ उर्फ ‘वीसलदेव चौहान’ ने ‘हरकेलि नाटक‘ लिखा था, यह उनके द्वारा लिखित एक संस्कृत भाषा का नाटक था, जिसका शिलालेख मस्जिद स्थल पर मिला।

Military Operations of Vigraharaja IV Visaladeva (सैन्य अभियान)

विग्रहराज चतुर्थ उर्फ बीसलदेव Visaladeva एक शक्तिशाली राजा था। आज हमारे पास बीसलदेव से सम्बंधित वि.1210 से वि.1220 तक के ग्यारह शिलालेख उपलब्ध हैं। इनमें से छह शिलालेख अजमेर से, एक मेवाड़ के जहाजपुर जिले के लोहारी से, एक जयपुर संभाग के नरहड़ से और तीन अशोक के शिवालिका स्तंभ से, जो अब दिल्ली में है से प्राप्त हुए हैं।

विग्रहराज चतुर्थ उर्फ बीसलदेव (Visaladeva) ने तोमर वंश के राजा से दिल्ली को जीत लिया और चालुक्य राजा कुमारपाल पर हमला किया और अपने पिता की हार का बदला लेने के लिए पल्लिका और नद्दुल के क्षेत्रों को नष्ट कर दिया। निरंतर सैन्य अभियान जारी रखते हुए उसने परमार राजा पर हमला करने के बाद जावलीपुरा को जला दिया।

विग्रहराज चतुर्थ का नरहर शिलालेख 1215 (1159 ई.) हमें बताता है कि विग्रहराज चतुर्थ ने शेखावाटी के विस्तृत क्षेत्रों पर शासन किया था। बिजौलिया शिलालेख में उसके शोषण और दिल्ली तथा हांसी पर कब्जा करने का उल्लेख है। पालम बावड़ी और दिल्ली संग्रहालय के क्रमशः वि. 1337 और वि. 1384 के शिलालेखों के अनुसार दिल्ली पर चौहानों द्वारा कब्जा करने से पहले तोमरों का कब्जा था। हांसी को तोमरों ने गजनवियों से वापस ले लिया था और संभवतः चौहानों द्वारा विजय प्राप्त करने तक यह उन्हीं के हाथों में रहा।

विग्रहराज चतुर्थ उर्फ बीसलदेव (Vigraharaja IV (Visaladeva)) ने मुसलमानों के खिलाफ कई युद्ध लड़े और उनसे यमुना और सतलज के बीच का क्षेत्र जीत लिया। जब समकालीन हम्मीरा (“हम्मीरा” बहराम शाह हो सकता है) ने विग्रहराज चतुर्थ को अपने अधिकार में आने के लिए आमंत्रित किया। तो आगामी लड़ाई में विग्रहराज चतुर्थ उर्फ बीसलदेव ने हम्मीर को बुरी तरह से पराजित किया।

लेकिन वि. 1220 तक, जिस वर्ष उसके शिवालिक स्तंभ शिलालेखों को काटा गया था, वह अधिकांश हिंदू क्षेत्रों को मुस्लिम गजनवियों के प्रभुत्व से मुक्त कराने में सफल हो गया था। उस वर्ष के बाद केवल पंजाब ही मुसलमानों के अधीन रहा।

विग्रहराज चतुर्थ उर्फ बीसलदेव के बारे में कुछ और जानकारी एक शिलालेख के अंश से मिली है उसने शिवालिका क्षेत्र तक आक्रमण किया था और अशोक के एक स्तंभ पर अपना शिलालेख लिखवाया। इस प्रकार उन्होंने एक बड़ा साम्राज्य बनाया और ‘महाराजाधिराज‘ और ‘परमेश्वर‘ की उपाधियाँ धारण कीं। दिल्ली की विजय ने शाकंभरी और अजमेर के चौहानों को एक अखिल भारतीय शक्ति में बदल दिया।

वह एक अच्छे योद्धा होने के साथ-साथ एक महान कवि भी थे। इनके द्वारा हरिकेलि नामक नाटक लिखा गया था। उनके कवि पुरस्कार विजेता सोमदेव के द्वारा ‘ललितविग्रहनाटक लिखा गया। उन्होंने संस्कृत महाविद्यालय की भी स्थापना की, जिसे बाद में अल्तुतुमाश (Shamsuddin Altamash or better known today as Iltutmish) ने एक मस्जिद में परिवर्तित कर दिया।

विग्रहराज चतुर्थ ने कई शहरों की स्थापना की, जिन्हें उन्होंने अपने वैकल्पिक नाम विशाला के नाम पर विशालापुरा कहा। इनमें से एक खाई जैसी घाटी के मुहाने पर स्थित है जो मेवाड़ में गिरवर पर्वत श्रृंखला से होते हुए राजमहल तक जाती है। पृथ्वीराजविजय के अनुसार विग्रहराज चतुर्थ ने जितनी पहाड़ी किलों पर कब्जा किया, उतनी ही इमारतें बनवाईं। हालाँकि, मुस्लिम विजेताओं के प्रतिष्ठित उत्साह के कारण, उनमें से केवल कुछ ही बच पाए हैं। कई को नष्ट कर दिया गया और कई को मुस्लिम संरचनाओं में बदल दिया गया।

Literary works of Vigraharaja IV (साहित्यिक कृतियाँ)

विग्रहराज चतुर्थ Vigraharaja IV, जिनको ‘वीसलदेव चौहान‘ के नाम से भी जाना जाता है एक अच्छे योद्धा होने के साथ-साथ एक महान कवि भी थे। इनके द्वारा (Harakeli Nataka) ‘हरिकेलि‘ नामक नाटक लिखा गया था। और विग्रहराज द्वारा लिखित इस हरिकेलि नाटक के अंश भी ‘अढ़ाई दिन का झोंपड़ा‘ में दो स्लैबों पर अंकित पाए गए। यह नाटक प्राचीन कवि ‘भारवि‘ की कृति ‘किरातार्जुनिया‘ पर आधारित है।

  • उनके पुरस्कार विजेता कवि सोमदेव के द्वारा ‘ललितविग्रहराज‘ नाटक उनके सम्मान में लिखा गया। इस नाटक के केवल कुछ टुकड़े ही अजमेर की मस्जिद से बरामद हुए थे।  विग्रहराज के दरबारी कवि द्वारा रचित नाटक ‘ललिता-विग्रहराज‘ नाटक में दावा किया गया है कि उनकी सेना में 10 लाख लोग शामिल थे जिसमें 1,00,000 घोड़े और 1,000 हाथी शामिल थे। विग्रहराज चतुर्थ Vigraharaja IV का काल राजपूत युग में ‘साहित्य का स्वर्ण युग’ कहा जाता है।
  • विग्रहराज चतुर्थ उर्फ बीसलदेव ने अपने दरबार में कई विद्वानों को संरक्षण दिया क्युकि वे स्वयं एक महान कवि थे। जयानक भट्ट ने इनको कवि बांधव की उपाधि दी।  जयानका ने अपनी कृति ‘पृथ्वीराज-विजय’ में स्पष्ट रूप से कहा है कि जब विग्रहराज उर्फ बीसलदेव की मृत्यु हुई, तो कवि-बांधव kavi-bandhava (“कवियों का मित्र”) नाम इतिहास से गायब हो गया।
  • बीसलदेव चौहान महान कवि एवं जनप्रिय शासक था इस वजह से सिर्फ इसी चौहान शासक की तुलना ‘कालिदास’ से की गई है। और बीसलदेव चौहान के शासनकाल को ही ‘चौहानों का स्वर्णकाल’ कहा जाता है।
  • बीसलदेव रासो – बीसलदेव रासो (Visaldev Raso) एक काव्य रचना है और इस रचना का सृजन कवि ‘नरपति नाल्ह‘ (Narpati Malah / Narpati Nalha/Narpati Nalh) ने विक्रम संवत 1212 में किया था। बीसलदेव रासो (Visaldev Raso) में बीसलदेव के जीवन के 12 वर्षों का वर्णन किया गया है। यह आदिकाल की श्रेष्ठतम कृतियों में से एक है। इसमें राजा बीसलदेव के नाम पर काव्य रचना की गई है, लेकिन काव्य का केंद्रबिंदु राजमती है।

 ‘ माना जाता ह

Cultural Activities of Vigraharaja IV (सांस्कृतिक गतिविधियां)

  • बिसलदेव मंदिर (Bisaldeo Temple / BisalDev Mandir), जिसे बिसलदेव मंदिर या बिसल देवजी का मंदिर भी कहा जाता है, भारत के बीसलपुर में एक हिंदू मंदिर है। यह राजस्थान राज्य के टोंक जिले में बनास नदी पर ‘बीसलपुर बांध’ के बगल में स्थित है। यह मंदिर शिव के एक स्वरूप ‘गोकर्णेश्वर‘ को समर्पित है
बिसलदेव मंदिर (Bisaldeo Temple BisalDev Mandir)
  • विग्रहराज (Vigraharaja IV (Visaladeva)) द्वारा अजमेर में ‘संस्कृत शिक्षा केंद्र‘ बनवाया गया, जिसे बाद में घुरिद आक्रमणकारियों (घुरिद राजवंश पूर्वी ईरानी मूल का एक फारसी राजवंश था) ने नष्ट कर दिया और इसको ‘अढ़ाई दिन का झोंपड़ा मस्जिद‘ (Adhai Din Ka Jhonpra mosque) में परिवर्तित कर दिया। इस केंद्र में पत्थरों पर कई साहित्यिक कृतियाँ उकेरी गई थीं।
Vigraharaja's Sanskrit learning centre was converted into the Adhai Din Ka Jhonpra mosque
  • अपने पूर्वजों की तरह ही, विग्रहराज चतुर्थ एक कट्टर शैव थे, जैसा कि उनके हरकेलि-नाटक से संकेत मिलता है। उन्होंने कई जैन विद्वानों को भी संरक्षण दिया और उनके धार्मिक समारोहों में भाग लिया। जैन धार्मिक गुरु धर्मघोष-सूरी के अनुरोध पर, उन्होंने एकादशी के दिन पशु वध पर प्रतिबंध लगा दिया था। बिजोलिया शिलालेख में विग्रहराज को “जरूरतमंदों और संकटग्रस्त लोगों का रक्षक” बताया गया है। बाद में उनका उत्तराधिकारी उनका पुत्र अमरगांगेय बना।
  • बीसलदेव चौहान ने वर्तमान के टोंक जिले में बीसलपुर कस्बा बसाया था। साथ ही उस वक्त बीसल सागर बाँध (कभी कभी बीसलसर बाँध कहा जाता है) का निर्माण करवाया था।
  • बीसलदेव चौहान ने भगवान श्रीराम आधारित स्वर्ण सिक्के चलाये थे जिस पर एक ओर भगवन श्रीराम धनुष लेकर खड़े हैं और सिक्के के दूसरी ओर ‘श्रीमद विग्रह राजा देवा” देवनागरी में अंकित है। इस दुर्लभ सिक्के को आप नीचे चित्र में देख सकते हैं। हमें कुछेक ही सिक्के मिले हैं क्युकि बीसलदेव चौहान के बाद बीसलदेव के पुत्र और जग्गदेव के पुत्र के बीच खूनी संघर्ष चलेगा और सत्ता को पितृहन्ता जग्गदेव का पुत्र पृथ्वीराज द्वितीय हतिया लेगा और सभी सिक्कों को पिघलवा देगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न और उत्तर

1. “पितृ हंता” जग्गदेव का शासन काल कब से कब तक रहा?
उत्तर: 1155 से 1158 ई तक।

2. विग्रहराज IV का वास्तविक नाम क्या था?
उत्तर: बीसलदेव चौहान (बिसल देओ)

3. विग्रहराज IV का शासन काल कब से कब तक रहा?
उत्तर: 1158 से 1163 ई तक।

4. “हरिकेली” नाटक के रचियेता थे?
उत्तर: विग्रहराज चतुर्थ उर्फ बीसलदेव चौहान (बिसल देओ)

5. “ललित विग्रहराज” नाटक के रचियेता थे?
उत्तर: विग्रहराज चतुर्थ उर्फ बीसलदेव चौहान के दरबार के राजकवि ‘सोमदेव’ “ललित विग्रहराज” नाटक के रचियेता थे।

6. “बीसलदेव रासो” के रचियेता थे?
उत्तर: बीसलदेव रासो पुरानी पश्चमी राजस्थानी की एक सुप्रसिद्ध रचना है। इसके रचनाकार ‘नरपति नाल्ह’ हैं।

7. निम्न में से किसने दिल्ली के तोमर शासक “तंवर” को परास्त कर दिल्ली पर अधिकार किया?
उत्तर: विग्रहराज चतुर्थ उर्फ बीसलदेव चौहान ने।

8. निम्न में से किस चौहान शासक ने अजमेर में संस्कृत पाठशाला एवं सरश्वती मंदिर का निर्माण करवाया था?
उत्तर: विग्रहराज चतुर्थ उर्फ बीसलदेव चौहान ने।

9. निम्न में से किसने अजमेर में ‘संस्कृत पाठशाला’ को तोड़कर उसे ‘अढ़ाई दिन के झोपड़े’ में तब्दील कर दिया?
उत्तर: कुतबुद्दीन ऐबक ने।

10. कुतबुद्दीन ऐबक किसका सेनापति था?
उत्तर: मुहम्मद गौरी (शिहाबुद्दीन उर्फ मुइज़ुद्दीन मुहम्मद गौरी) का सेनापति था।

11. निम्न में से किस शासक ने टोंक में बीसल सागर बाँध और बीसलपुर कस्बा बसाया था?
उत्तर: विग्रहराज चतुर्थ उर्फ बीसलदेव चौहान ने।

12. निम्न में से किस शासक ने भारत की राजधानी को दिल्ली से अजमेर शिफ्ट कर दिया था?
उत्तर: विग्रहराज चतुर्थ उर्फ बीसलदेव चौहान ने।

13. निम्न में से किस चौहान शासक के काल को चौहानों का “स्वर्णकाल” कहा जाता है?
उत्तर: विग्रहराज चतुर्थ उर्फ बीसलदेव चौहान ने।

14. निम्न में से किस चौहान शासक की तुलना ‘कालिदास’ से की जाती है?
उत्तर: विग्रहराज चतुर्थ उर्फ बीसलदेव चौहान ने।

15. मेघदूत एवं अभिज्ञान शाकुंतलम जैसे महान ग्रन्थ किसने लिखे?
उत्तर: कालिदास ने।

16. दिल्ली के शिवालिका स्तम्भ लेख में विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) को किसका अवतार बताया गया है?
उत्तर: विष्णु का।

17. गुजरात के चालुक्य शासक कुमारपाल ने अर्णाराज पर आक्रमण किया लेकिन इस आक्रमण को अर्णोराज ने विफल कर दिया यह जानकारी हमें “प्रबंध चिन्तामणि” नामक ग्रन्थ से मिलती है जिसके रचियेता हैं?
उत्तर: मेरूतुंग।

18. ‘अलेक्जेंडर कनिंघम’ ने किस इमारत को “अजमेर की महान मस्जिद” के रूप में वर्णित किया था ?

उत्तर: अढ़ाई दिन के झोपड़े (Adhai Din Ka Jhonpra) को। 

19. अढ़ाई दिन के झोपड़े (Adhai Din Ka Jhonpra) का वास्तुकार (डिजाइनर) कौन था ?
उत्तर: 1192 ई. में कुतुब-उद-दीन-ऐबक द्वारा निर्मित और हेरात के अबू बक्र द्वारा डिजाइन की गई, यह संरचना 1199 ई. में पूरी हुई और 1213 ई. में दिल्ली के इल्तुतमिश द्वारा इसे और बढ़ाया गया।

20. अढ़ाई दिन के झोपड़े (Adhai Din Ka Jhonpra) भारतीय, हिंदू, मुस्लिम और जैन वास्तुकला का नायाब मिश्रण किस आधार पर है?
उत्तर: जैन परंपरा के अनुसार, इस संरचना का निर्माण सेठ विरमदेव काला द्वारा 660 ई. में पंच कल्याणक मनाने के लिए एक जैन मंदिर के रूप में किया गया था। और पुरालेख साक्ष्य से पता चलता है कि इस स्थान पर शाकंभरी चाहमान (चौहान) वंश के राजा विग्रहराज चतुर्थ (उर्फ विशालदेव) द्वारा निर्मित एक संस्कृत कॉलेज भवन था। इसमें सरस्वती को समर्पित एक मंदिर पश्चिमी तरफ स्थित था। 

बाद में मुस्लिम शासकों ने इसे अढ़ाई दिन के झोपड़े (Adhai Din Ka Jhonpra) में तब्दील कर दिया। 12वीं शताब्दी के अंत में दिल्ली के कुतुब-उद-दीन-ऐबक द्वारा मूल इमारत को आंशिक रूप से नष्ट कर दिया गया और एक मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया।

21. शाकंभरी के चाहमान (चौहान) वंश के राजा विग्रहराज चतुर्थ (उर्फ विशलदेव) द्वारा निर्मित संस्कृत कॉलेज भवन कैसे एक मस्जित में तब्दील हो गया ?
उत्तर: 12वीं शताब्दी के अंत में दिल्ली के कुतुब-उद-दीन-ऐबक द्वारा मूल इमारत को आंशिक रूप से नष्ट कर दिया गया और एक मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया। जब तराइन की दूसरी लड़ाई में विग्रहराज के भतीजे पृथ्वीराज तृतीय को हराने के बाद, घोर के मुहम्मद गौरी अजमेर से होकर गुजरे। वहां, उन्होंने भव्य मंदिरों को देखा, और अपने गुलाम जनरल कुतुब-उद-दीन-ऐबक को उन्हें नष्ट करने और एक मस्जिद का निर्माण करने का आदेश दिया 

यह सब 60 घंटों के भीतर (यानी, 2+1⁄2 दिन)। कारीगर 60 घंटे के समय में एक पूरी मस्जिद का निर्माण नहीं कर सके, लेकिन एक ईंट की स्क्रीन की दीवार का निर्माण किया जहां गोरी प्रार्थना कर सकता था। सदी के अंत तक, एक पूरी मस्जिद का निर्माण किया गया।

22. चौहान शासक विग्रहराज-IV उर्फ बीसलदेव चौहान के तीन शिलालेखों का उल्लेख किस स्तंभ में है?
उत्तर: टोपरा का स्तंभ में। विग्रहराज का दिल्ली-शिवालिक स्तंभ शिलालेख हरियाणा के टोपरा गांव में स्थित है। यह शिवालिक पहाड़ियों के नजदीक है।

Pillar of Topra inscriptions of ruler Vigraharaja - IV

2 thoughts on “Vigraharaja IV (Visaladeva) Chauhan (Chahamana) Dynasty”

  1. Pingback: Amaragangeya (Aparagangeya) | Chahamana Dynasty | Chauhan Dynasty - RPSC Blog

  2. Pingback: Prithviraja II (Prithviraj II) | Chahamana Dynasty or Chauhan Dynasty. - RPSC Blog

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!